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पेट्रोल-डीजल की कीमतें: दिल्ली से राहत, हिमाचल में बोझ? बड़ा सवाल

केंद्र ने घटाई एक्साइज ड्यूटी, हिमाचल में ₹5 तक सेस का विकल्प खुला
राहत और संभावित बोझ के बीच आम आदमी पर असर बना बड़ा सवाल
दिल्ली से राहत, शिमला से फैसले पर सियासी और आर्थिक बहस तेज



पेट्रोल-डीजल की कीमतों को लेकर देशभर में राहत और चिंता के बीच अब हिमाचल प्रदेश एक अलग ही चर्चा का केंद्र बन गया है। केंद्र सरकार ने जहां पेट्रोल पर एक्साइज ड्यूटी को 13 रुपए से घटाकर 3 रुपए प्रति लीटर कर दिया है और डीजल पर इसे पूरी तरह खत्म कर दिया है, वहीं हिमाचल में ₹0.10 से ₹5 प्रति लीटर तक सेस लगाने का रास्ता खुलने से आम आदमी के लिए तस्वीर उतनी साफ नहीं दिख रही है।

इस पूरे घटनाक्रम में सबसे अहम सवाल यही है कि आखिर आम जनता को वास्तविक राहत मिलेगी या नहीं। अगर राज्य सरकार अधिकतम ₹5 प्रति लीटर तक सेस लागू करती है, तो केंद्र की ओर से मिली राहत काफी हद तक न्यूट्रल हो सकती है। यानी जो राहत दिल्ली से मिल रही है, वह शिमला के फैसले से कम या खत्म भी हो सकती है।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर क्रूड ऑयल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंचने से तेल कंपनियों पर भारी दबाव है। ऐसे में केंद्र सरकार ने कीमतों को नियंत्रित रखने के लिए टैक्स में कटौती की है। लेकिन हिमाचल सरकार का कहना है कि प्रस्तावित सेस से मिलने वाला राजस्व अनाथ बच्चों और विधवाओं के कल्याण के लिए इस्तेमाल किया जाएगा और यह सामाजिक जिम्मेदारी का हिस्सा है।

यही मुद्दा अब राजनीतिक बहस का केंद्र बन गया है। विपक्ष का आरोप है कि एक तरफ केंद्र राहत दे रहा है, तो दूसरी तरफ राज्य सरकार जनता पर अतिरिक्त बोझ डालने की तैयारी कर रही है। वहीं सरकार इसे जनहित और कल्याणकारी नीति बता रही है।

आर्थिक नजरिए से देखें तो तेल कंपनियां पहले ही पेट्रोल पर करीब 24 रुपए प्रति लीटर और डीजल पर 30 रुपए प्रति लीटर तक का घाटा झेल रही हैं। ऐसे में केंद्र का कदम कंपनियों को राहत देने के साथ-साथ बाजार को स्थिर रखने की कोशिश है।

अब सबकी नजर सुक्‍खू सरकार के अगले कदम पर टिकी है। यही तय करेगा कि प्रदेश में पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर राहत भारी पड़ेगी या बोझ। फिलहाल इतना जरूर है कि “दिल्ली से राहत, शिमला से बोझ?” वाला सवाल आम आदमी के बीच तेजी से चर्चा में है और यही आने वाले समय में बड़ा राजनीतिक मुद्दा भी बन सकता है।